एक सैनिक से जानिए 65 की लड़ाई की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी

एक सैनिक से जानिए 65 की लड़ाई की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी I

कैप्टन जयंत सरनजमे भले ही अब 76 साल के हो चुके हैं लेकिन 1965 का वो युद्ध आज भी उन्हें कल की बात लगता है, जब उन्होंने अपनी शेरदिली के दम पर 15 सितंबर 1965 को पाकिस्तानी टैंकों द्वारा भारतीय सेना पर किए गए हमले को नाकाम कर दिया था.

23 सितंबर 2015 को 1965 के भारत-पाक युद्ध को 50 साल पूरे हो गए. जब दोनों पड़ोसी इस बात के लिए बहस कर रहे हैं कि उस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी था तब हमने उस युद्ध में देश के लिए लड़ चुके एक पूर्व सैनिक से उनके अनुभव के आधार पर उस युद्ध की असली कहानी सुनी. कैप्टन जयंत सरनजमे भले ही अब 76 साल के हो चुके हैं लेकिन 1965 का वो युद्ध आज भी उन्हें कल की बात लगता है, जब उन्होंने अपनी शेरदिली के दम पर 15 सितंबर 1965 को पाकिस्तानी टैंकों द्वारा भारतीय सेना पर किए गए हमले को नाकाम कर दिया था. पढ़ें कैप्टन जयंत की कहानी उन्हीं की जुबानी

वो काली रात का एसिड टेस्ट 

15 सितंबर 1965 की वो रात हमारे लिए एसिड टेस्ट की तरह थी. ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर ए के लूथरा ने हमें सियालकोट कैन्टोनमेंट और उसके सामने स्थित 168 इन्फैन्ट्री ब्रिगेड सेक्टर में 8000 लैंड माइंस बिछाने के लिए सिर्फ 6 घंटे का वक्त दिया था. इससे दो दिन पहले 13 सितंबर को पाकिस्तानी पैटन टैंकों ने इंडियन आर्मी बटालियन एरिया में हमला करते हुए हमारे सैनिकों द्वारा 12 सितंबर को जीती गई कलारवांदा पोस्ट से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था. टैक्टिकली ये पोस्ट महत्वपूर्ण थी क्योंकि इस पर एक हिललॉक था जिसका भौगोलिक महत्व यह है कि इससे आप दुश्मन से एक कदम आगे रहते हैं.

15 सितंबर 1965 की सुबह 

15 सितंबर की सुबह हुई ऑपरेशनल मीटिंग में कर्नल प्रेम कुमार जो कि 8 JAK राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर थे ने बटालियन को पीछे हटाने का फैसला किया क्योंकि उनके पास आर्टिलरी सपोर्ट नहीं था. उन्होंने इस बारे में सफाई भी दी. कर्नल प्रेम कुमार ने 5 अगस्त 65 को चेनाब नदी के पास अखनूर में अपने 900 में से 300 सैनिकों को पाकिस्तानी टैंकों से कुचले जाते देखा था. कर्नल प्रेम के दिमाग में अभी वो बुरी याद जिससे सैनिकों का मनोबल टूट सा गया था, बिल्कुल ताजा थी. और अब 13 सितंबर को फिर से पाकिस्तानी पैटन टैंकों ने इनके आदमियों की परेशानी और बढ़ा दी थी क्योंकि इनके पास बस राइफल और मशीनगनें थीं. कोई भी एंटी टैंक हथियार नहीं था.

जिद पर अड़े ब्रिगेडियर ए के लूथरा 

लेकिन ब्रिगेड कमांडर कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे. वो चाहते थे कि कर्नल प्रेम सौंपे गए काम को हर हाल में पूरा करें. उन्होंने कर्नल प्रेम कुमार को अपनी पैदल सेना के साथ आगे बढ़कर कलारवांदा पोस्ट को फिर से अपने कब्जे में लेने का ऑर्डर सुना दिया. इस काम में छिपे खतरे को देखते हुए कर्नल की जुबान को मानो काठ मार गया और वो सोचने लगे कि आखिर सिर्फ पैदल सेना के सहारे हम ये दुष्कर कार्य कैसे करेंगे. कर्नल ने मांग की कि उन्हें अपनी बटालियन एरिया के सामने लैंड माइन चाहिए. जिससे काउंटर अटैक के वक्त उनके आदमियों को थोड़ी सुरक्षा मिले.

कहानी आठ हजार लैंड माइंस की

ब्रिगेड कमांडर लूथरा ने 8000 माइन्स देते हुए सेकेंड लेफ्टिनेंट सरनजमे को इन्हें लगाने की जिम्मेदारी दे दी. सेकेंड लेफ्टिनेंट जयंत सरनजमे ने इस काम की जिम्मेदारी लेते हुए मार्किंग, खुदाई और माइन्स की ढुलाई के लिए कर्नल प्रेम की बटालियन से अतिरिक्त जवानों की मांग की. कर्नल प्रेम के पास अपने राइफलमैन्स को खुदाई और ढुलाई के काम में लगाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था, 

उन्होंने हां कर दी. 8 JAK राइफल्स के अलावा दो अन्य बटालियन्स ने भी इस काम में मदद की. ब्रिगेड कमांडर ने अगला आदेश माइन्स को ट्रक में ही आर्म करने का दिया. हालांकि आमतौर पर माइन को पिट में डालने के बाद उसे आर्म किया जाता है. इस काम के लिए ब्रिगेड कमांडर द्वारा सेकेंड लेफ्टिनेंट जयंत सरनजमे को चुनने के पीछे का कारण कमांडर का लेफ्टिनेंट पर अटूट भरोसा था. युवा सरनजमे कुछ ही महीने पहले हजारों लैंड माइन्स को लगा और निकाल चुके थे.

युवा लेफ्टिनेंट की शेरदिली

उस रात 10 ट्रकों में 8000 लैंड माइन्स को लोड किया गया. सेकेंड लेफ्टिनेंट सरनजमे और उनके 61 जवानों ने अपनी जान को जोखिम में डालते हुए एक्टिवेटेड लैंड माइन्स से लदे उन ट्रकों में अपनी यात्रा शुरू की. स्याह अंधेरी रात में ट्रक सियालकोट की तरफ बढ़ने लगा. मिलिट्री के ड्राइवर्स ने बिना हेडलाइट जलाए उन लोडेड ट्रकों को बड़ी कुशलता से मैदान के रास्ते से निकाला. इस मूवमेंट को छिपाने के लिए ट्रकों की पार्किंग लाइट को भी बंद कर दिया गया था. आर्मी ट्रकों के टायर प्रेशर को इस तरह से मैनेज किया गया था कि ट्रक उछलें ना जिससे उनमें रखी माइन्स फटकर भीषण दुर्घटना का कारण ना बनें.

दुश्मन को भनक भी ना लगी

सब कुछ प्लान के मुताबिक ही हुआ और सारी टीमें अपनी-अपनी मंजिल पर पहुंच गईं जिससे लैंड माइन्स को लगाने का काम आधी रात से एक घंटे पहले ही निपट गया. इस वक्त तक दुश्मन भी सतर्क होता दिख रहा था. पाकिस्तानी आर्मी ने मोर्टार दागने शुरू कर दिए थे. मशीन गन की फायरिंग, बमों का फटना, गोलियां हर तरफ बस धमाकों का ही शोर था I

ऐसा लग रहा था जैसे घड़ी रोज से कुछ ज्यादा ही तेज टिक-टिक कर रही थी. मानों पैरों के नीचे से रेत फिसलती जा रही थी. ऐसी परिस्थितियों में किसी आम इंसान का दिल तो दोगुनी तेजी से धड़कने लगता लेकिन ऐसे हालात से निपटने के लिए ट्रेंड किए गए सेकेंड लेफ्टिनेंट जयंत सरनजमे अपने जवानों के साथ तीन ग्रुप में बंटकर शांत लेकिन तेज रफ्तार और पूरे कौशल के साथ एक के बाद एक गढ्ढों में लैंड माइन बिछा रहे थे I

दुश्मन की नाक के नीचे लगा डाली लैंड माइंस जयंत के दुस्साहस का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस रात उन्होंने अपने जवानों के साथ दुश्मन के खेमे से महज 1500 मीटर की दूरी तक माइन्स बिछा डाली थीं और दुश्मन को कानों कान खबर नहीं हो पाई थी I

लेफ्टिनेंट जयंत ने बड़ी होशियारी से इस काम में पेड़ों की सूखी पत्तियों की मदद ली और पक्की सड़क पर भी लैंड माइन बिछाकर उसे सूखी पत्तियों से ढक डाला. अपने इस काम के लिए उन्हें 1966 में गैलेंट्री अवॉर्ड सेना मेडल से नवाजा गया, लेकिन आज भी उनकी वीरता किसी अनसुनी दास्तान की तरह है.

लोगों को तो पता ही नहीं कि कैप्टन जयंत ने 1965 की उस लड़ाई में क्या किया था. कैप्टन जयंत को ये बात भी सालती है कि रिकॉर्ड्स में ये बात कहीं भी नहीं है कि उन्होंने 1965 की लड़ाई मे 8000 लैंड माइन्स बिछाई थीं I

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